Tag: dard bhare sher

दरमियाँ शायरी – दरमियाँ फासलों की उठती दीवार

दरमियाँ फासलों की उठती दीवार थी
और मेरे दिल की बनती मज़ार थी

फ़क्त मैं ही नहीं था कल बेचैन बहुत
कल तो शब भी बहुत बेक़रार थी

बेदर्द शायरी – इतना दर्द न दे मुझे,

इतना दर्द न दे मुझे, बेदर्द न हो जाऊ
तेरी हर खबर,फिर बेखबर न हो जाऊ
उम्र ही गुज़र जाती है एतबार करने मे
फिर कैसे टूट के अब मै बेफिक्र हो जाऊ

हरजाई शायरी – ये इनायत भी नही कम

ये इनायत भी नही कम मेरे हरजाई की
जख्म देता है मगर दाम नही लेता है…
जो कि रूसवाई से डरता तो है बहोत वो
वह मेरा नाम सरेआम नहीं लेता है…