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इंतिक़ाम शायरी – ये काएनात भी क्या क़ैद-ख़ाना

ये काएनात भी क्या क़ैद-ख़ाना है कोई
ये ज़िंदगी भी कोई तर्ज़-ए-इंतिक़ाम है क्या

हरजाई शायरी – ये इनायत भी नही कम

ये इनायत भी नही कम मेरे हरजाई की
जख्म देता है मगर दाम नही लेता है…
जो कि रूसवाई से डरता तो है बहोत वो
वह मेरा नाम सरेआम नहीं लेता है…

हरजाई शायरी – हुस्न के जाने कितने चेहरे

हुस्न के जाने कितने चेहरे हुस्न के जाने कितने नाम
इश्क़ का पैशा हुस्न परस्ती इश्क़ बड़ा हरजाई है

हरजाई शायरी – कभी अपनी सी कभी ग़ैर

कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आई है
कभी इख़्लास की मूरत कभी हरजाई है

हरजाई शायरी – वादा करके वो निभाना भूल

वादा करके वो निभाना भूल जाते है
लगा कर आग फिर वो बुझाना भूल जाते हैं
ऐसी आदत हो गयी है अब तो उस हरजाई की
रुलाते तो है मगर मनाना भूल जाते है