हिना शायरी – मैं भी पलकों पे सजा

मैं भी पलकों पे सजा लूँगा लहू की बूँदें
तुम भी पा-बस्ता-ए-ज़ंजीर-ए-हिना हो जाना

हिना शायरी – चंद मासूम से पत्तों का

चंद मासूम से पत्तों का लहू है “फ़ाकिर”
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं

हिना शायरी – मिटा सकी न उन्हें रोज़

मिटा सकी न उन्हें रोज़ ओ शब की बारिश भी
दिलों पे नक़्श जो रंग-ए-हिना के रक्खे थे