मुख़ातिब शायरी – इक तो बंदिश भी कमाल,

इक तो बंदिश भी कमाल, फिर अर्ज़ लाज़वाब
मुख़ातिब हमसे न हों, इश़्क भी हो बेहिसाब

मुख़ातिब शायरी – ये सोच कर ही खुद

ये सोच कर ही खुद से मुख़ातिब रहे सदा
क्या गुफ़्तुगू करेंगे तमाशाइयों से हम