Category: शुमार शायरी

शुमार शायरी – कभी मै भी अपनों में

कभी मै भी अपनों में शुमार था
कभी तू भी मुझपे जा निसार था
ये किस्मत नही तो और क्या है
ये सब खाब था और खुमार था

शुमार शायरी – ज़रा सी बात पे क्या

ज़रा सी बात पे क्या क्या न खो दिया मैं ने
जो तुम ने खोया है उस का शुमार तुम भी करो

शुमार शायरी – मेरे जज़्बातों से है खेलना,

मेरे जज़्बातों से है खेलना, ज़माने की आदतों मे शुमार,
ग़र खिलौना बनके हम बिकते, तो किसी एक के तो होते.