मुसलसल शायरी – ऐ ख़ुशनुमा लम्हे तेरे आमद

ऐ ख़ुशनुमा लम्हे तेरे आमद की ख़ैर हो,
इस दर्द-ए-मुसलसल से उकता गए थे हम

मुसलसल शायरी – बस इक ख़ता की मुसलसल

बस इक ख़ता की मुसलसल सज़ा अभी तक है..
मेरे ख़िलाफ़ मेरा आईना अभी तक है…

मुसलसल शायरी – इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की

मुसलसल शायरी – एक मुसलसल चोट सी लगती

एक मुसलसल चोट सी लगती रहती है
सामना ख़ुद अपना है हर हर बार मुझे