Category: आज़ार शायरी

आज़ार शायरी – ये वो काँटा है निकलता

ये वो काँटा है निकलता नहीं चुभ कर दिल से
ख़लिश-ए-इश्क़ का आज़ार बुरा होता है

आज़ार शायरी – मै तुम पे किस तरह

मै तुम पे किस तरह कर लूँ यकीन ऐ मेरे शनास,
के पिछले हादसे के ज़ख्म और आज़ार बाक़ी है.

आज़ार शायरी – एक आज़ार हुई जाती है

एक आज़ार हुई जाती है शोहरत हम को
ख़ुद से मिलने की भी मिलती नहीं फ़ुर्सत हम को